Ghaziabad News: इस बार सावन माह का आरंभ बहुत ही शुभ योग में होगा। सावन 30 जुलाई को आरंभ होगा। इस बार सावन आयुष्मान और केतु योग में आरंभ होगा। सावन की शिवरात्रि 11 अगस्त को रात्रि 04:54 बजे स्थिर योग, सिद्धि योग ,चतुर्ग्रही योग,गज केसरी योग, बुधादित्य योगों में लगेगी। इसके बाद गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक आरंभ होगा। शिव शंकर ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र के पंडित शिवकुमार शर्मा के अनुसार श्रावण का पवित्र महीना शिव की आराधना और उनकी पूजा के लिए विशेष है। सावन मास में भगवान शिव की कांवड़ यात्रा का उत्सव परंपरागत रूप से मनाया जाता है। लाखों शिव भक्त कांवड़ियां के रूप में गंगोत्री,गंगा आदि पवित्र नदियों से गंगाजल लेकर अपने अपने स्थानीय मंदिरों में भगवान शिव पर जलभिषेक करते हैं।
लाखों कांवड़ियां करते हैं जलाभिषेक
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सबसे बड़े भगवान शिव के मंदिर जहां पर लाखों कांवडियां हर साल जलाभिषेक करते हैं। बागपत जिले में पुरा महादेव में और गाजियाबाद में भगवान दूधेश्वरनाथ मंदिर में शिवरात्रि पर शिवभक्तों की भारी भीड़ जुटती है।
31 जुलाई से 9 अगस्त तक विशिष्ट मुहूर्त में 6 कांवड़ धारण करने की मुहूर्त है। जो इस प्रकार है।
31 जुलाई- धाता योग
1 अगस्त -आनंद योग
3 अगस्त – गद योग
4 अगस्त -शुभ योग
5 अगस्त -रवि योग
8 अगस्त -श्री वत्स योग
9 अगस्त -सौम्य योग
इन योगों में कांवड़ उठाने का बहुत ही शुभ योग है।
शिवरात्रि का व्रत 10 अगस्त को है
इस बार त्रयोदशी तिथि का क्षय हो गया है। शिव त्रयोदशी का व्रत 10 अगस्त को रखा जाएगा जिनका पारायण 11 अगस्त को प्रातःकाल होगा। भगवान शिव का गंगाजल से अभिषेक होगा। इस दिन स्थिर योग , सिद्धि योग, चतुर्ग्रही योग गज केसरी योग, बुधादित्य योग आदि बहुत ही शुभ योग बन रहे हैं। 11 अगस्त को प्रातः 4:54 बजे से
कांवड़ियां गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे। 12 अगस्त को हरियाली अमावस्या है। शिवरात्रि को भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए विशेष कर गंगाजल से अभिषेक होता है। लेकिन इस दिन भगवान शिव को दूध, दही गंगाजल ,शहद आदि पंचामृत से स्नान भी कराया जाता है।
इस दिन भगवान को बिल्व पत्र चढ़ाने का बहुत महत्व है। इस दिन भक्तगण अपनी विभिन्न कामनाओं की प्राप्ति के लिए भगवान शिव को विशिष्ट पूजन सामग्रियों से अभिषेक भी करते हैं। कुछ लोग भगवान को भांग ,धतूरा,आक के पुष्प चढ़ाते हैं।शास्त्रीय दृष्टि से यह उचित नहीं है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष के प्रभाव से पृथ्वी के प्राणियों की रक्षा की थी और विष को अपने गले में ही रख लिया था। उसकी तेज अग्नि से उनका कंठ नीला पड़ गया। इसलिए उनका एक नाम नीलकंठ भी है।उस विष के प्रभाव को शांत करने के लिए लिए दूध, गंगाजल आदि से उनको अभिषेक करते हैं। विषैले पदार्थों भांग आदि उनको चढ़ाना वर्जित है। भांग धतूरा आदि भगवान शिव पर अर्पित करना मध्यकालीन तांत्रिक शास्त्रों में तो वर्णित है जो किसी विशेष वामपंथी पूजा के लिए किया जाता था जबकि वैदिक पूजन शास्त्र में कोई उल्लेख नहीं है । लोकाचार के रूप में प्रसिद्ध है। भगवान शिव की लोक कथाओं के आधार पर नहीं, उनके कल्याणकारी रूप में पूजा करनी चाहिए।
आयुष्मान और केतु योग में 30 जुलाई को शुरू होगा सावन माह, 31 से कांवड़ यात्रा
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