Tuesday, October 20, 2026
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चुनाव की निष्पक्षता तथ्यों, प्रक्रिया और जनता की भागीदारी पर निर्भर

New Delhi News: चुनाव प्रणाली की निष्पक्षता न केवल चुनाव कराने के तरीके पर निर्भर करती है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि जनता उन प्रक्रियाओं को कितना समझती है जिनसे वोटर लिस्ट (मतदाता सूची) तैयार, संशोधित और अंतिम रूप दी जाती है। ‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) को लेकर हाल ही में हुई सार्वजनिक बहस ने ड्राफ्ट-स्टेज की जानकारी और वोटर लिस्ट के अंतिम आंकड़ों के बीच अंतर को समझने के महत्व को उजागर किया है।
एक व्यापक रूप से फैलाया जा रहा दावा “13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए जाने” के बारे में है। चुनाव आयोग की उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह आंकड़ा ड्राफ्ट-स्टेज की अलग-अलग श्रेणियों की प्रविष्टियों से संबंधित है, जिसमें लगभग 2.8 करोड़ मृत, 3 करोड़ अनुपस्थित/न मिल पाने वाले, 6.3 करोड़ स्थायी रूप से स्थानांतरित और 1 करोड़ कई बार पंजीकरण वाले मतदाता शामिल हैं। ये श्रेणियां 13 करोड़ अंतिम नामों को हटाने के बराबर नहीं हैं। अंतिम वोटर लिस्ट तैयार होने से पहले, सत्यापन, दावों और आपत्तियों तथा अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चलती रहती है।
1990 में टीएन शेषन ने किए थे मुखर प्रयोग
भारत का चुनावी इतिहास दिखाता है कि संस्थागत विश्वसनीयता समय के साथ बनी है। 1990 के दशक में टीएन शेषन का कार्यकाल आयोग की मौजूदा शक्तियों के अधिक मुखर प्रयोग के लिए याद किया जाता है, जिसमें आदर्श आचार संहिता का सख्ती से पालन और आयोग की भूमिका की अधिक दृश्यता शामिल है। उस दौर का महत्व केवल यह नहीं था कि आयोग ने शक्ति का प्रयोग किया, बल्कि यह था कि नागरिकों ने इसे राजनीतिक दबावों से स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम संस्था के रूप में देखा।
तीन दशक बाद, चुनौती का स्वरूप अलग
तीन दशक बाद, चुनौती का स्वरूप अलग है। आयोग ऐसे सूचना परिवेश में काम करता है जहां कोई दावा संदर्भ समझे जाने से पहले ही लाखों स्क्रीन तक पहुंच सकता है। चुनावी डेटा, प्रशासनिक निर्णयों और तकनीकी प्रक्रियाओं को एक हेडलाइन या छोटे वीडियो में बदला जा सकता है। ऐसे परिवेश में, संस्थागत संचार चुनावी पारदर्शिता का हिस्सा बन जाता है। वोटर लिस्ट संशोधन पर हालिया बहस इस बात को स्पष्ट करती है। ड्राफ्ट प्रक्रिया से जुड़ी बड़ी संख्या का अर्थ उसके वास्तविक प्रशासनिक दर्जे से बहुत अलग हो सकता है। आयोग का अपना चुनावी ढांचा नाम शामिल करने के दावों, प्रस्तावित समावेश या हटाने पर आपत्तियों और सुधार या निवास परिवर्तन के आवेदनों के बीच अंतर करता है। इसलिए, जनता के संदेह का उत्तर केवल यह नहीं हो सकता कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक प्राधिकरण है। संवैधानिक दर्जा आयोग के अधिकार क्षेत्र को स्थापित करता है; जब उस अधिकार का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से किया जाता है और उसके फैसलों को समझा और उनकी जांच-पड़ताल की जा सकती है, तो जनता का भरोसा मज़बूत होता है।
स्वतंत्र संवैधानिक संस्था सबकी सहमति लेकर काम नहीं कर सकती
इसका मतलब यह नहीं है कि आयोग को हर आलोचक को संतुष्ट करना होगा। कोई भी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था सबकी सहमति लेकर काम नहीं कर सकती। हालांकि, इसके लिए ज़रूरी है कि वह अपनी प्रक्रियाओं को साफ़ तौर पर बताए, ज़रूरी जानकारी आसानी से उपलब्ध कराए और शुरुआती जानकारी, प्रशासनिक फैसलों और अंतिम नतीजों के बीच अंतर स्पष्ट करे। यही सिद्धांत गलतियों पर भी लागू होता है। भारत जैसे बड़े पैमाने पर चुनावी प्रक्रिया चलाने वाली संस्था में गलतियां, चूक और विवाद होना स्वाभाविक है। संस्था की विश्वसनीयता के लिए यह दिखावा करने की ज़रूरत नहीं है कि ऐसी समस्याएं नहीं हो सकतीं।
तय प्रक्रियाओं के ज़रिए गलतियों की पहचान की जा सकती है
इसके लिए यह दिखाना ज़रूरी है कि तय प्रक्रियाओं के ज़रिए गलतियों की पहचान की जा सकती है, उन्हें सुधारा जा सकता है और उनके लिए जवाबदेही तय की जा सकती है। यहां एक बड़ा संवैधानिक सबक है। संस्थाएं तब मज़बूत होती हैं जब उनके अधिकार के साथ पारदर्शिता भी हो। स्वतंत्र बने रहने के लिए चुनाव आयोग को जांच-पड़ताल से अलग-थलग रहने की ज़रूरत नहीं है। इसके उलट, अनुमान लगाने योग्य प्रक्रियाएं, आसानी से उपलब्ध जानकारी और तर्कपूर्ण स्पष्टीकरण स्वतंत्रता को और अधिक विश्वसनीय बना सकते हैं। चुनावों में जनता के भरोसे को किसी संस्था में बिना सवाल किए विश्वास के तौर पर नहीं समझा जाना चाहिए। इसका मतलब यह भरोसा होना चाहिए कि संस्था के पास काम करने का अधिकार है, गलतियों को सुधारने की प्रक्रियाएं हैं और अपने फैसलों को समझाने के लिए खुलापन है।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता ज़्यादा टिकाऊ आधार
आखिरकार, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का यही ज़्यादा टिकाऊ आधार है: यह उम्मीद नहीं कि नागरिक बिना सवाल किए भरोसा करें, बल्कि एक ऐसी चुनावी व्यवस्था जिसमें नागरिकों के पास भरोसा करने का ठोस कारण हो, क्योंकि संस्था लगातार यह दिखाती है कि वह कैसे और क्यों काम करती है।

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