Ghaziabad News: फरियादियों से व्यवहार में बेहद ‘सज्जन’ लेकिन विभागीय निगरानी में ‘महा कामचोर’! यह दास्तान है गाजियाबाद के जिला पूर्ति अधिकारी की, जिनके राज में कोटेदारों तक राशन पहुंचाने का ठेका लेने वाली ट्रांसपोर्ट कंपनी अपनी मर्जी चला रही है। जब ट्रैक्टर-ट्रॉली से राशन ढोने पर सवाल उठा, तो साहब का जवाब था—”इससे गली में मोड़ने में आसानी होती है।” इस अजीबोगरीब तर्क के पीछे छिपे भ्रष्टाचार और डीलरों के डर की पूरी कहानी।
पाठकों। ‘गंगा महिमा’ पत्रिका हमेशा से जनहित की आवाज को बुलंद करने और सबूतों के आधार पर प्रशासन व सत्ता के गलियारों में बैठे जिम्मेदार चेहरों को आईना दिखाने का काम करती रही है। इसी कड़ी में हम गाजियाबाद जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) यानी सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों पर पहुंचने वाले राशन के परिवहन में चल रहे एक बहुत बड़े सुनियोजित खेल का पर्दाफाश कर रहे हैं। इस पूरे मामले में जिला पूर्ति अधिकारी (डीएसओ) की भूमिका बेहद संदेहास्पद और घोर लापरवाही (‘महा कामचोरी’) की श्रेणी में नजर आ रही है।
गाजियाबाद में नियम-कायदों को ताक पर रख दिया
सरकार का नियम है कि गोदामों से राशन सीधे डीलरों की दुकानों तक सुरक्षित और नियमानुसार पहुंचे। इसके लिए बकायदा टेंडर प्रक्रिया के तहत ट्रांसपोर्ट कंपनियों को ठेका दिया जाता है, जिनकी निगरानी की पूरी जिम्मेदारी पूर्ति अधिकारी की होती है। लेकिन गाजियाबाद में नियम-कायदों को ताक पर रख दिया गया है। सिद्धार्थ विहार डीपीएस चौराहे की लाल बत्ती पर गेहूं और चावल से भरे बड़े सरकारी ट्रक आकर खड़े होते हैं। यहाँ से राशन को अवैध रूप से कृषि कार्य में इस्तेमाल होने वाले ट्रैक्टर-ट्रालियों में ओवरलोड करके भरा जाता है। नियमत: ट्रांसपोर्ट कंपनी को टाटा 407, कैंटर, छोटा हाथी या अन्य थ्री-फोर व्हीलर कमर्शियल वाहनों का इस्तेमाल करना चाहिए था, जिसके लिए उन्हें भुगतान मिलता है। मगर यहां खुलेआम कृषि ट्रैक्टरों का इस्तेमाल कमर्शियल ढुलाई के लिए हो रहा है।
जब ‘गंगा महिमा’ पत्रिका के संपादक ने इस गंभीर विषय पर जिला पूर्ति अधिकारी (डीएसओ) से सीधा सवाल किया कि ‘ट्रैक्टर-ट्रालियों में सरकारी सस्ते गल्ले की सामग्री कैसे और क्यों ले जाई जा रही है?’ तो साहब ने नियम-कानूनों का हवाला देने के बजाय एक बेहद हास्यास्पद और गैर-जिम्मेदाराना दलील दे डाली। डीएसओ साहब ने तर्क दिया कि ”ट्रैक्टर को गली में मोड़ने में आसानी होती है, इसलिए उससे माल भेजा जा रहा है।” यह बयान ही साहब की ‘कामचोरी’ और ट्रांसपोर्टर के साथ कथित मिलीभगत को उजागर करने के लिए काफी है। क्या टेंडर की शर्तों में ‘गली में मोड़ने की आसानी’ देखकर कृषि वाहनों को छूट देने का प्रावधान है? बिल्कुल नहीं।
डीएसओ साहब डीलरों के इसी डर का फायदा उठा रहे
गंगा महिमा की टीम ने जब गाजियाबाद के विभिन्न राशन डीलरों से धरातल पर जाकर वार्ता की, तो एक और चौंकाने वाला सच सामने आया। नियम के मुताबिक राशन दुकानों तक पहुंचाने का भाड़ा ट्रांसपोर्टर को उठाना होता है। लेकिन यहाँ डीलर अपनी जेब से गेहूं और चावल का भाड़ा भरने को मजबूर हैं। वे डर से इतने सहमे हुए हैं कि कोई भी खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। डीएसओ साहब डीलरों के इसी डर का फायदा उठा रहे हैं और ट्रांसपोर्ट कंपनी का मालिक अपनी मनमर्जी चला रहा है और राशन डीलरों को भाड़े के नाम पर अपनी जेब ढ़ीली करनी पड़ रही है। इस पूरे खेल में उत्तर प्रदेश सरकार के राजस्व को सीधे तौर पर भारी नुकसान पहुँचाया जा रहा है। व्यावसायिक माल ढोने के लिए कमर्शियल पासिंग (पीली नंबर प्लेट) वाले वाहनों का उपयोग अनिवार्य है, जिससे सरकार को टैक्स मिलता है। यहाँ चालाकी देखिए—टैक्स बचाने के लिए खेती-किसानी वाले ट्रैक्टरों का इस्तेमाल हो रहा है और पकड़े जाने के डर से उन पर ‘खाद्य रसद’ का बैनर टांग दिया गया है, ताकि पुलिस या आरटीओ (आरटीओ) की टीम सरकारी सामग्री समझकर इन्हें रोके नहीं। यह सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन और टैक्स चोरी का मामला है, जिसे पूर्ति विभाग का पूरा संरक्षण प्राप्त है। पीली नंबर प्लेट वाले जिन टैÑक्टर-ट्रॉली में राशन सामग्री को ओवरलोड करके भरा जाता जाता है, उनका चालान तक नहीं होता।
कोई लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई
‘गंगा महिमा’ पत्रिका ने पत्रकारिता के सिद्धांतों का पालन करते हुए गाजियाबाद के पूर्ति अधिकारी से इस संबंध में लिखित रूप से सूचना और उनका पक्ष मांगा था। लेकिन लिखित जवाब देने के बजाय सिर्फ गुमराह करने की कोशिश की गई और समय मांग लिया गया। इतना ही नहीं, जब पत्रिका के संपादक ने डीएसओ साहब से राशन दुकानों की निगरानी करने वाले पर्यवेक्षकों की सूची मांगी, तो दिनांक 29 जून 2026 तक भी कोई लिखित जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। सूचना छुपाने की यह छटपटाहट खुद गवाही देती है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
हैरानी की बात यह है कि पूर्ति अधिकारी का जनता और कार्यालय में आने वाले फरियादियों से बातचीत करने का व्यवहार बेहद शालीन और अच्छा है। वह आईजीआरएस पोर्टल पर आने वाली शिकायतों का भी समय से निस्तारण करा देते हैं। लेकिन जब बात धरातल पर ईमानदारी से काम करने और भ्रष्ट तंत्र पर नकेल कसने की आती है, तो वह पूरी तरह ‘कामचोर’ साबित होते हैं।
घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडरों के व्यावसायिक दुरूपयोग
यह पहली बार नहीं है जब पूर्ति विभाग की लापरवाही सामने आई है। ‘गंगा महिमा’ पत्रिका ने पूर्व में भी घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडरों के व्यावसायिक दुरूपयोग की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। अगर पूर्ति अधिकारी अपनी वातानुकूलित कुर्सी से उठकर ईमानदारी से फील्ड में जांच करें, तो घरेलू गैस के दुरूपयोग पर तुरंत विराम लग सकता है और सरकार के राजस्व को भारी लाभ होगा। जिला पूर्ति अधिकारी (डीएसओ) की नाक के नीचे पूरे गाजियाबाद में घरेलू एलपीजी गैस सिलेंडरों (14.2 किग्रा) का धड़ल्ले से व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा रहा है। नियम के मुताबिक, किसी भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान—जैसे होटल, रेस्टोरेंट, ढाबा, चाय की दुकान या चाट-पकौड़ी की ठेली—पर केवल नीले रंग के कमर्शियल सिलेंडर (19 किग्रा) का ही इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन गाजियाबाद की जमीनी हकीकत इसके उलट है। जिले के प्रमुख बाजारों, सड़क के किनारे बने ढाबों और गली-मोहल्लों के रेस्टोरेंटों, चाय की दुकानों यहां तक कि खानपान की ठेलियों परखुलेआम लाल रंग के बड़े घरेलू सिलेंडर इस्तेमाल होते हुए देखे जा सकते हैं।
गाजियाबाद के ‘महा कामचोर’ डीएसओ साहब के राज में यह कार्रवाई सिर्फ कागजी आंकड़ों तक सिमट कर रह गई
नियमानुसार विभाग को समय-समय पर ढाबों और रेस्टोरेंटों पर छापेमारी कर अवैध सिलेंडर जब्त करने चाहिए और कड़ी कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। मगर गाजियाबाद के ‘महा कामचोर’ डीएसओ साहब के राज में यह कार्रवाई सिर्फ कागजी आंकड़ों तक सिमट कर रह गई है। कभी-कभार खानापूर्ति के लिए एक-दो जगह छापे मार दिए जाते हैं, लेकिन ठोस कार्रवाई न होने के कारण घरेलू सिलेंडरों के दुरूपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लग पा रहा है। कुल मिलाकर राशन परिवहन में ट्रैक्टर-ट्रॉली का घोटाला हो या फिर सड़कों पर धधकते घरेलू गैस सिलेंडर-गाजियाबाद का पूर्ति विभाग हर मोर्चे पर पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। सजग पत्रिका होने के नाते ‘गंगा महिमा’ पत्रिका जनता और सरकार के हित में यह सवाल उठाती रहेगी। ‘गंगा महिमा’ का उद्देश्य किसी की छवि धूमिल करना नहीं, बल्कि जनता के हक के राशन और सरकार के राजस्व की चोरी को रोकना है। राशन डीलरों का उत्पीड़न बंद होना चाहिए और टेंडर की शर्तों का उल्लंघन करने वाली ट्रांसपोर्ट कंपनी पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।

