Saturday, June 13, 2026
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शिकायत पर बेसिक शिक्षा विभाग की चुप्पी और आरटीआई का जवाब देने में भी टालमटोल

नंदग्राम स्थित डॉ. आर.एम.एल. पब्लिक स्कूल और पंच विहार लालकुआं स्थित न्यू दयावती पब्लिक स्कूल पर मेहरबानी क्यों?

शिक्षा को समाज का सबसे पवित्र स्तंभ और राष्ट्र के भविष्य की नींव माना जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद में यह व्यवस्था गंभीर सवालों के घेरे में है। जिले के विभिन्न इलाकों में बड़ी संख्या में ऐसे निजी स्कूल संचालित हो रहे हैं, जो नियमों की खुलेआम अनदेखी करते हुए शिक्षा को एक मुनाफे के कारोबार में बदल चुके हैं। इन तथाकथित ‘शिक्षा संस्थानों’ की स्थिति यह है कि न तो इनके पास पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं हैं और न ही योग्य शिक्षक, फिर भी ये धड़ल्ले से बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। अवैध स्कूलों का तेजी से फैलता नेटवर्क: गाजियाबाद की गलियों और मोहल्लों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आए कई निजी स्कूल बिना मान्यता या सीमित मान्यता के बावजूद उच्च कक्षाओं का संचालन कर रहे हैं। कई स्कूलों के पास न खेल का मैदान है, न अग्नि सुरक्षा के इंतजाम और न ही प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति। चौंकाने वाली बात यह है कि इन स्कूलों को अक्सर कम शिक्षित लेकिन प्रभावशाली लोग चला रहे हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य केवल आर्थिक लाभ अर्जित करना है। मान्यता के नाम पर बड़ा खेल: सूत्रों के अनुसार, यह
मामला केवल अवैध संचालन तक सीमित नहीं है, बल्कि एक बड़े रैकेट का हिस्सा है। कई मान्यता प्राप्त विद्यालय चंद पैसों के लालच में अपना नाम और पंजीकरण इन अवैध स्कूलों को ‘किराए’ पर दे देते हैं। इसके तहत अवैध स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों का नाम कागजों में किसी दूरस्थ मान्यता प्राप्त स्कूल में दर्ज दिखाया जाता है। परीक्षा के समय ये स्कूल मोटी रकम लेकर परिणाम और प्रमाण पत्र जारी करते हैं। यह व्यवस्था न केवल शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि पूरी प्रणाली की पारदर्शिता को भी खत्म करती है। कानून सख्त, अमल ढीला: नि:शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत बिना
मान्यता स्कूल चलाना पूर्णत: गैरकानूनी है। अधिनियम की धारा 18(1) के अनुसार कोई भी विद्यालय बिना मान्यता के संचालित नहीं किया जा सकता। वहीं धारा 18(5) के तहत नियमों के उल्लंघन पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना और निरंतर उल्लंघन की स्थिति में प्रतिदिन 10 हजार रुपये तक का अतिरिक्त दंड निर्धारित है। 2025 का जांच अभियान और अधूरी कार्रवाई: अगस्त-सितंबर 2025 में शिक्षा विभाग ने प्रदेशभर में
निजी स्कूलों की मान्यता की जांच के लिए अभियान चलाया था गाजियाबाद में भी निरीक्षण के दौरान कई अनियमितताएं सामने आईं। माध्यमिक शिक्षा टीम को ऐसे पांच स्कूल मिले जिनकी मान्यता केवल आठवीं तक थी, लेकिन वहां नौवीं से बारहवीं तक की कक्षाएं संचालित हो रही थीं। जिला विद्यालय निरीक्षक ने 11 अगस्त को इन स्कूलों को नोटिस जारी कर सात दिन में स्पष्टीकरण देने और अवैध संचालन बंद करने की चेतावनी दी। सितंबर 2025 में कुछ स्कूलों पर कार्रवाई भी हुई, लेकिन जांच के दायरे में आए 26 अवैध बेसिक स्कूलों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। हैरानी की बात यह है कि कुछ ही समय बाद यह जांच अभियान भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। शिकायतें अनसुनी, आरटीआई में भी टालमटोल:गाजियाबाद के जिला बेसिक शिक्षा कार्यालय में लगातार
निजी स्कूलों की मान्यता को लेकर शिकायतें पहुंच रही हैं। बीती 24 मार्च को ‘जन सहयोग संस्थान’ ने नंदग्राम स्थित डॉ. आर.एम.एल. पब्लिक स्कूल और पंच विहार लालकुआं स्थित न्यू दयावती पब्लिक स्कूल की मान्यता और मानकों पर सवाल उठाते हुए जांच की मांग की। विभाग ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। वहीं इससे पहले 21 फरवरी को संस्थान के सह सचिव संजय शर्मा ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के
तहत इन स्कूलों के दस्तावेज मांगे थे। उन्होंने केवल वे दस्तावेज मांगे थे जो गोपनीय श्रेणी में नहीं आते, फिर भी विभाग ने जानकारी देने के बजाय संबंधित स्कूलों के ‘असहमति पत्र’ उपलब्ध करा दिए। दोनों स्कूलों ने सूचना साझा करने से इनकार कर दिया, और विभाग ने भी इस मामले में कोई ठोस पहल नहीं की। विभागीय भूमिका पर उठते सवाल: इस पूरे प्रकरण में शिक्षा विभाग की भूमिका सबसे अधिक संदेह के घेरे में है। न तो शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई हो रही है और न ही पारदर्शिता सुनिश्चित की जा रही है। इससे यह आशंका बलवती होती है कि नियमों का उल्लंघन करने वाले स्कूलों को कहीं न कहीं विभागीय संरक्षण
प्राप्त है। भविष्य से खिलवाड़ कब तक?: गाजियाबाद में अवैध और अनियमित स्कूलों का यह जाल न केवल शिक्षा व्यवस्था की साख को कमजोर कर रहा है, बल्कि हजारों बच्चों के भविष्य को भी संकट में डाल रहा है। यदि समय रहते इस पर सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं की गई, तो यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। जरूरत है कि प्रशासन पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ ठोस कदम उठाए, ताकि शिक्षा वास्तव में समाज के विकास का आधार बन सके, न कि केवल मुनाफे का साधन।

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