Ghaziabad News: गाजियाबाद विकास प्राधिकरण’ (जीडीए) के दावे बड़े-बड़े हैं-‘अवैध निर्माण पर जीरो टॉलरेंस’, ‘भू-माफियाओं पर नकेल’, और ‘नियोजित गाजियाबाद’। लेकिन जब इन दावों की परतें जमीनी हकीकत से टकराती हैं, तो सच कुछ और ही निकलता है। गाजियाबाद के अलग-अलग प्रवर्तन जोनों से सामने आए तीन मामले यह साबित करने के लिए काफी हैं कि जीडीए के प्रवर्तन जोनों में तैनात अभियंताओं के लिए अवैध निर्माण रोकना प्राथमिकता में नहीं हैं बल्कि असली मकसद सिर्फ फाइलों का पेट भरना और ‘नोटिस’ भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेना है। आइए, सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं कि कैसे अवैध निर्माणों के बारे में की गई शिकायतों पर संबंधित अधिकारी और अभियंता मूकदर्शक बने रहे हैं।
पहला मामला: भूखंड संख्या सी-12, न्यू विजयनगर सेक्टर-9, गाजियाबाद
शिकायत के निस्तारण में महज खानापूर्ति, खड़ी हो गई पांच मंजिला इमारत
विजयनगर का यह इलाका पहले से ही घनी आबादी और संकरी गलियों से जूझ रहा है। इसी क्षेत्र के सेक्टर-9 स्थित भूखंड संख्या सी-12 पर जब भवन निर्माण उपविधि को ताक पर रखकर पांच मंजिला इमारत का निर्माण शुरू हुआ, तो जागरूक नागरिक संजय शर्मा ने इसकी आवाज उठाई और 23 मई 2026 को जनसुनवाई पोर्टल पर शिकायत संख्या: 40014026031767 दर्ज कराई। शिकायत मिलने के बाद प्रवर्तन जोन-4 के अधिकारियों ने मौके का मुआयना किया। अपनी आख्या (रिपोर्ट) में अधिकारियों ने साफ तौर पर स्वीकार किया कि यह निर्माण स्वीकृत मानचित्र के विपरीत है और इसमें ‘सैट बैक’ (इमारत के चारों तरफ छोड़ी जाने वाली अनिवार्य जगह) को प्रभावित किया गया है।
दिखावे की कार्रवाई:
उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 की सुसंगत धाराओं के तहत निर्माणकर्ता को नोटिस जारी कर दिया गया। प्रकरण को वाद संख्या जीडीए/जेड-4/एएनआई/2025/000487 के रूप में दर्ज कर सुनवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।
बड़ा सवाल: शिकायतकर्ता संजय शर्मा का कहना है कि जब उन्होंने शिकायत दर्ज कराई थी, तब निर्माण बिल्कुल शुरूआती चरण में था। अगर जीडीए के पास सचमुच प्रवर्तन की शक्ति थी, तो उसी वक्त पुलिस बल के साथ मौके पर जाकर काम क्यों नहीं रुकवाया गया? ‘सुनवाई का अवसर’ देने के नाम पर बिल्डर को हफ्तों का समय दे दिया गया, जिसका फायदा उठाकर आज वहां पांच मंजिला अवैध इमारत बनकर लगभग तैयार है। क्या यह सीधे तौर पर बिल्डर को संरक्षण देना नहीं है?
दूसरा मामला 2: भूखंड संख्या-72, वैशाली सेक्टर-6, गाजियाबाद
पॉश इलाके में बेसमेंट से लेकर ऊपर तक ढांचे का खेल, कागजी कार्रवाई के बीच धड़ल्ले से चलता काम
वैशाली जैसे पॉश और महंगे इलाके की स्थिति भी विजयनगर से अलग नहीं है। नियमों के मुताबिक आवासीय भूखंडों पर बिना कड़े मानकों और विशेष अनुमति के कमर्शियल या बड़े स्तर पर बेसमेंट का निर्माण प्रतिबंधित है, क्योंकि इससे आसपास के मकानों की नींव को खतरा पैदा हो जाता है। इस मामले में पहली आॅनलाइन शिकायत 17 मार्च 2026 को शिकायतकर्ता गोविंद ने की थी। बताया गया था कि भूखंड संख्या-72 पर स्वीकृत नक्शे का उल्लंघन करके अवैध रूप से बेसमेंट खोदा और बनाया जा रहा है। प्राधिकरण ने अपनी जांच आख्या में माना कि मौके पर अवैध रूप से निर्माण कार्य चल रहा है। मगर फिर से वही घिसा-पिटा फॉर्मूला अपनाया गया—उत्तर प्रदेश नगर नियोजन एवं विकास अधिनियम, 1973 के तहत नोटिस थमा दिया गया।
बड़ा सवाल: मार्च से लेकर अब तक कई महीने बीत चुके हैं। हाल ही में जागरूक नागरिक संजय शर्मा ने भी इस मामले में शिकायतें दर्ज कराईं लेकिन नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ ही रहा। नोटिस मिलने के बावजूद बिल्डर ने एक दिन के लिए भी काम नहीं रोका। आज बेसमेंट के ऊपर का ढांचा भी खड़ा किया जा रहा है। क्या जीडीए के नोटिसों में इतनी भी कानूनी ताकत नहीं है कि वे एक अवैध रूप से चल रहे फावड़े या मिक्सर मशीन को रुकवा सकें?
तीसरा मामला: भूखंड संख्या-47 कुनाल रेजीडेंसी , विजय नगर सेक्टर-9 गाजियाबाद
तीन मंजिल का नक्शा पास, किया मनमाना निर्माण, फिर अनदेखी क्यों?
यह मामला तो जीडीए के प्रवर्तन तंत्र की रीढ़ पर ही चोट करता है। जब एक बिल्डर को प्राधिकरण से कुछ रियायत मिलती है, तो वह पूरे नियम को ही लील जाता है। इस मामले में अशोक कुमार शर्मा ने 15 मई 2026 को आॅनलाइन शिकायत संख्या: 40014026029543 दर्ज कराई थी जिसमें उन्होंने विजय नगर सेक्टर-9 स्थित भूखंड संख्या-47 पर नियमों के विपरीत कुनाल रेजीडेंसी बहुमंजिला इमारत का निर्माण होने की शिकायत की थी। शिकायत में कहा गया कि करीब तीन सौ गज के भूखंड पर बनी इस बहुमंजिला इमारत में बिल्डिंग बाइलॉज की अनदेखी करते हुए निचले हिस्से पर पार्किंग स्थल को कॉमर्शियल स्पेस में तब्दील किया गया है जिसमें कॉमर्शियल एक्टिविटी की जा रही है।
जीडीए की अजीबोगरीब आख्या
जीडीए ने अपनी रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला सच स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि संबंधित स्थल पर बेसमेंट, स्टिल्ट, अपर ग्राउंड और तीन मंजिलों का नक्शा तो पास है, लेकिन बिल्डर ने स्वीकृत मानचित्र के विपरीत भारी ‘विचलन’ करते हुए अतिरिक्त मंजिलों और कवर्ड एरिया का निर्माण कर लिया है। प्राधिकरण ने कहा कि धारा 27 व 28 के तहत कार्रवाई शुरू कर दी गई है और मामला ‘विचाराधीन’ है।
बड़ा सवाल: अशोक कुमार शर्मा का कहना है कि जब अधिकारी खुद मान रहे हैं कि नक्शा तीन मंजिल का है और वहां मनमाना निर्माण किया गया है, तो फिर मामला ‘विचाराधीन’ रखकर किस बात का इंतजार किया जा रहा है?
इन तीनों मामलों का गहन विश्लेषण करने पर एक बहुत ही चिंताजनक और संगठित पैटर्न उभर कर सामने आता है। यह पैटर्न इशारा करता है कि प्राधिकरण के भीतर बैठे कुछ अधिकारी और अभियंता ‘नोटिस’ को अवैध निर्माण रोकने के हथियार के रूप में नहीं, बल्कि बिल्डर के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
जब भी कोई नागरिक जनसुनवाई या आईजीआरएस (आईजीआरएस) पोर्टल पर शिकायत करता है, तो अधिकारियों पर जवाब देने का दबाव होता है। इस दबाव से बचने के लिए वे तुरंत एक नोटिस जारी कर देते हैं और पोर्टल पर स्टेटस अपडेट कर देते हैं—”कार्रवाई शुरू कर दी गई है, वाद दर्ज है।” तकनीकी रूप से, उच्च अधिकारियों और सरकार की नजर में कागजों पर कार्रवाई दिखती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह होती है कि इस कानूनी प्रक्रिया और ‘सुनवाई के अवसरों’ की आड़ में बिल्डर को 2 से 2 महीने का निर्बाध समय मिल जाता है। इन तीन महीनों में दिन-रात लेबर लगाकर अवैध इमारत को लेंटर डालकर खड़ा कर दिया जाता है। एक बार जब इमारत पूरी बन जाती है, तो फिर उसे ढहाना या सील करना और अधिक जटिल हो जाता है।

